ताजमहल के बदलते रंग पर SC ने जताई चिंता, अब हो रहा इस तकनीक के उपयोग पर विचार

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जानकारी के अनुसार संसद भवन में संरक्षण के कार्य में वाष्प तकनीकी का उपयोग करने वाले केंद्रीय लोक निर्माण विभाग (सीपीडब्ल्यूडी) के सूत्रों ने बताया कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने वाष्प एवं माइक्रो वेपर ब्लास्टिंग तकनीक के अनुभवों के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए विभाग से सम्पर्क किया था और यह जानना चाहा था कि ताजमहल के संदर्भ में इसका किस प्रकार से उपयोग किया जा सकता है।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के सूत्रों ने बताया कि ताजमहल के संगमरमर के रंग बदलने के कारणों की जांच के लिए 27 मई 2016 को आगरा के तत्कालीन जिलाधिकारी की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया था। इस समिति में पुरातत्व विभाग के आगरा क्षेत्र के अधीक्षण रसायन विशेषज्ञ डॉ. एम के भटनागर सदस्य थे।

डॉ. भटनागर ने बताया कि ताजमहल पर बार-बार लगने वाले धब्बों का सबसे बड़ा कारण यमुना का प्रदूषित पानी है। जब तक इस समस्या का समाधान नहीं होगा तब तक ताजमहल की दीवारों पर लगे धब्बों को स्थाई तौर पर नहीं हटाया जा सकता। उन्होंने कहा कि कीड़ों की एक प्रजाति गोल्डीचिरोनोमस है जो बार-बार ताज की बाहरी दीवारों पर हमला करती है। एक साल में 4 से 5 बार इन कीटों का ताजमहल पर हमला होता है। इसका कारण जानने के लिए कुछ समय पहले भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने एक अध्ययन किया था।

अध्ययन में पता चला कि ये कीट यमुना के प्रदूषित पानी में पलते हैं और वहां से आकर ताजमहल की बाहरी दीवारों पर बैठते हैं। चूंकि एएसआई ताजमहल के बाहर कुछ नहीं कर सकती इसलिए इस अध्ययन की रिपोर्ट जिला प्रशासन को भेजी गई थी । जिला प्रशासन से कहा गया था कि यमुना नदी में पानी का स्तर बढ़ाते हुए पानी के प्रवाह को तेज किया जाए और उसे साफ करने की पहल की जाए। समिति ने सुझाव दिया था कि चूंकि कीड़े रात के समय और कृत्रिम प्रकाश में अधिक सक्रिय होते हैं, अत: ताजमहल पर रात के समय प्रकाश की व्यवस्था को प्रतिबंधित किया जाए।

उल्लेखनीय है कि उच्चतम न्यायालय ने विश्व धरोहर ताजमहल के बदलते रंग पर चिंता व्यक्त करते हुए कुछ ही दिन पहले कहा था कि सफेद रंग का यह स्मारक पहले पीला हो रहा था लेकिन अब यह भूरा और हरा होने लगा है। ऐसे में भारतीय और विदेशी विशेषज्ञों की मदद से नुकसान का आकलन और इस ऐतिहासिक स्मारक का मूल रूप बहाल करने के लिए कदम उठाए जाएं।